Saturday, December 23, 2023

कलियुग (कतिपय दोहे )

कैसा कलियुग आ गया, नहीं तात का तात।

रिश्ते नाते सब मृषा, साथ देत निज गात ।। 


धर कोरोना रूप को, क्रीड़ा करता काल ।

एक तुला में सब तुले, नृप हो या कंगाल।। 


अर्थी को काँधा नहीं, वर सह नहीं बरात। 

चक्र काल का यूँ चला , जैसे वज्राघात।। 



Sunday, April 30, 2023

ऐ पेट तू मुझे बिल्कुल नहीं भाता है!

ऐ पेट तू मुझे बिल्कुल नहीं भाता है! 
  बिना बात के तू बस बढ़ता जाता है!! 

 जब तक तू रहता है भीतर! 
 तभी तक तू लगता है सुन्दर!! 
 बाहर आते ही तू कमर से 
कमरा बन जाता है! 
ऐ पेट तू मुझे बिल्कुल नहीं भाता है!!

कभी ऊपर से उचका , 
कभी नीचे से थुल-थुल लटका 
तो कभी गोल-मटोल, और 
बेडौल नजर आता है 
ऐ पेट तू मुझे बिल्कुल नहीं भाता है!!

कोई चाय की टेबल कहता, 
तो कोई बोरी अनाज की! 
तेरी बिगड़ी सूरत देखकर 
 हर कोई मुँह बिचकाता है!! 
ऐ पेट तू मुझे बिल्कुल नहीं भाता है!!

दूसरे के कंधे पर रखकर बंदूक 
तू बड़े मज़े से चलाता है! 
जिव्हा को भी तू अपनी उँगलियों 
नचाता है!! 
सच- सच बता कि जिव्हा से तेरा क्या नाता है! 
ऐ पेट तू मुझे बिल्कुल नहीं भाता है!!

 नमकीन, मिठाई, तीखा, कड़वा 
 सबकुछ तो ठूँस- ठूँस खाता है! 
 गैस, बदहजमी ,अपच, 
 सबको अपने पास बुलाता है!! 
निरोगी काया को तू रोगी बनाता है! 
 ऐ पेट तू मुझे बिल्कुल नहीं भाता है!!

लोगों को पसंद है तारीफ अपनी
 पर तू, तू तो हरदम गालियाँ खाता है! 
 कुछ तो शर्म कर, अरे!!! 
क्यों तू अपनी इतनी बेज्जती कराता है?
 अब क्या कहूँ, कितना कहूँ ऐ पेट,
 बस तू मुझे बिल्कुल नहीं भाता है!! 

Saturday, April 8, 2023

रिश्तेदार व उनके घरों के नाम

1:माता - पिता का घर - मायका, नइहर, नैहर पीहर, 
2:नाना - नानी का घर - ननिहाल, ननिआउर
3:दादा - दादी का घर - ददिहाल 
4:सास - ससुर (श्वसुर) का घर - ससुराल 
5: बुआ - फूफा का घर - फुफुआउर 
6:मौसी - मौसा का घर - मौसिआन


 

Tuesday, November 22, 2022

बदलो... कि बदलाव है ज़रूरी :नुक्कड नाटक

नुक्कड नाटक : 
विषय : सामाजिक समुत्थानशक्ति (COMMUNITY RESILIENCE)
[कुछ कठिन या बुरा होने के बाद फिर से खुश, सफल आदि होने की क्षमता, प्रतिरोधक्षमता, लचीलापन] 

बदलो …….. कि बदलाव है जरूरी

अवधि :10 मिनट 
पात्र :
1:आशा
2:गाँव का सरपंच/मुखिया (आशा का पिता )
3:आशा की दाई
4:फूल चंद :सरपंच का नौकर
5:एक दर्शक
6:कोरस : (कई सारे)


कोरस :
सुनो सुनो भई ….सुनो सुनो
सुनो सुनो भई ….सुनो सुनो
रामपुरा की कथा सुनो
कैसे बदली रीत पुरानी
आओ सुनाए तुम्हे कहानी
सुनो सुनो भई ….सुनो सुनो
सुनो सुनो भई ….सुनो सुनो
रामपुरा की कथा सुनो

एक दर्शक :
रामपुरा की कथा?
कोरस :
हाँ रामपुरा की कथा..
दर्शक :
तुमने बोला रीत पुरानी
है क्या इसमें राजा रानी
कोरस :
नहीं नहीं भई नहीं.... नहीं
ना राजा ना रानी;
छोड़ पुरानी परिपाटी को
परिवर्तन की क़ीमत जानी
दर्शक :
परिवर्तन की क़ीमत जानी?
कोरस:
हाँ हाँ परिवर्तन की क़ीमत जानी
रामपुरा की यही कहानी

सूत्रधार :दृश्य 1:

दाई : (दुःखी होकर भागती हुई आती है। ) हुकुम , हमने बड़ी कोशिश की पर हम बाई -सा को बचा नहीं पाए।

मुखिया : (दुःखी होकर बैठ जाता है। फिर अचानक खुश होकर उठता है )अच्छा ….पर मुझे मेरा लल्ला तो दिखाओ।

दाई : लल्ला नहीं हुआ है हुकुम , बाई-सा ने एक बेटी को जन्म दिया है ;

मुखिया : क्याऽऽ ? बेटीऽऽ ?
(ग्रामीण आपस से फुसफुसाते हैं…..);

ग्रामीण 1:ये क्या अनर्थ हो गया? मुखिया जी के यहाँ बेटी हुई है!

ग्रामीण 2:बेटी? अब क्या होगा?
मुखिया जी तो ना जाने कितने वर्षों से बेटे की चाह में तड़प रहे हैं।

स्त्री 1:कहीं इसका हाल भी कालूमल की बेटी की तरह न हो जाए. कहीं उसे भी…

स्त्री 2:हाँ.. तुम तो जानती ही हो जिज्जी… ..मुखिया जी को बेटियों के नाम से भी नफरत है।

स्त्री 1: न जाने हम जनानियों की किस्मत भगवान किस कलम से लिखता है। हाय रे फूटी किस्मत!!!!!!! .(दुःखी होकर माथा पीट लेती है। )

मुखिया :दाई इसे ले जाकर किसी नदी में प्रवाहित कर दो। पिंड छूटे इस बला से…

स्त्री 1: (आपस में बात करते हुए); देखो मैंने कहा था न कि कालूमल की तरह ही…

स्त्री 2:हाँ… जिज्जी सही कहा आपणे।

दाई : हुकुम आप इसे एक बार देख तो लीजिए बड़ी फूटरीऽऽऽ.बिटिया है आपणी ।

मुखिया :दाई (गुस्से से) मैंने कहा न …इसे मेरी नज़रों के सामने से हटा दो।मेरे लिए ये किसी दुर्भाग्य से कम नहीं …जो पैदा होते ही अपनी माँ को खा गई वो तो मुझे बर्बाद ही कर देगी।……. एक तो सूखा…. ऊपर से इतनी महँगाई.. इसका खर्च कहाँ से उठाएंगे। फिर चार साल बाद इसके व्याह रो खर्चो… कहाँ से आवेंगे इसके दहेज के लिए लाखों रुपये…

दाई : लेकिन हुकुम केवल एक बार आप इस मासूम को प्यार भरी नज़रों से देख तो लीजिए … शायद…. 
.
मुखिया : मैंने कह दिया ना कि नहीं देखना ….जाओ इसको निपटा दो... (इधर उधर नजर घुमाते हुए) ये 
फूलचंद कहाँ गया?  ….फूलचंद...फूलचंद... (गुस्से से आवाज लगाता है। )

(फूलचंद भागता हुआ आता है और मुखिया के सामने मस्तक नीचे करके खड़ा हो जाता है)
फूलचंद: जी हुकुम….

मुखिया : इस कलंकिनी के मामा को बुलाकर उसे दे दो और कह देना कि अगर उन्हें इसे सम्हालना है तो सम्हालें…. नहीं तो इसे अनाथाश्रम में डाल दे … यह आज से मेरे लिए मर गई और ध्यान रखें कि यह मेरे नज़रों के सामने वापस कभी न आए।

फूलचंद: जी हुकुम …जैसा आप कहें .
(फूलचंद दाई के हाथ से उस बालिका को लेकर चला जाता है...) 

कोरस :1
ये नियति का खेल है या दुर्भाग्य बेटियों का…
क्या लड़का होता तब भी उसे ऐसे ही फेंक दिया जाता….
ये सोच कब बदलेगी???
कब बदलेगी??
कब बदलेगी??

सूत्रधार :
क्या लगता है आपको ? यह केवल मुखिया के घर का दृश्य है????
नहीं नहीं… यह तो रामपुरा के घर घर की कहानी है। 

कोरस : बेटियां... बेटियाँ... बेटियां !
बेटों की तरह ही रो -रोकर 
जन्म लेती हैंं बेटियाँ
बेटों की तरह ही 
शैतानी करती है बेटियाँ
यूँ तो लल्ला और लल्ली में 
फर्क़ तो नहीं
फिर उन दोनों के बीच भेदभाव
क्या है सही?

दृश्य 2:

23 साल बाद
सूत्रधार :
मामा मामी ने आशा को
पढ़ाया लिखाया और काबिल बनाया। 
उसकी हर इच्छा को
अपने सिर आखों पर बिठाया। 
लेकिन अपने बापू को मिलने की जिस ख्वाहिश को उसने था हमेशा से दबाया। 
आज उनसे मिलने की कामना को उसने अपने मन में था समाया। 

कोरस :चली, चली, भई चली, चली…
आशा लेकर आस चली!
बचपन में बिछुड़ी जो गली…
आशा उसकी राह चली!

रामपुरा गाँव का दृश्य…

(आशा अपने गांव पहुँचती है.…लोग अपने कामों में जुटे हैं।चारों तरफ़ प्राकृतिक सुंदरता दिखाई देती है। )..

आशा : यह गाँव दिखता है बड़ा ही निराला
पर माँ-सा और बापू-सा ने न जाने क्यूँ
इसके साथ मेरा फासला बढ़ा डाला!!!
(एक तरफ़ दाई अपने काम में व्यस्त है तभी उसपर आशा की नजर पड़ती है. )

आशा :दाई जी …दाई जी ….मैं आशा । पहचाना मुझे ?

दाई : आशा!!! छोरी!!! तू यहां के कर रही है ? यह जगह थारे वास्ते ठीक नहीं ….क्यूँ आई है वापस????

आशा : मैं आप सब से मिलने वास्ते आई हूँ …मने अपने बापू-सा से मिलना है. 

दाई जी : क्या ?... अपने बापू से ?.....
आशा ये ना हो सके है छोरी… . चली जा तू वापस …… अगर था रे बापू सा को पता चलेगा कि तू वापस आई है तो घोर अनर्थ हो जावेगा ….

आशा : नहीं.. दाई जी ऐसा नहीं होगा

दाई जी : तू चल म्हारे साथ पंचायत में फिर पता चलेगा थारे को. 

दृश्य:3
दाई : उधर देख थारे बापू - सा …… इस गांव के मुखिया हैं …कोई ग़म्भीर समस्या है…… उसी की चर्चा चल रही है ….मौका रहते तू निकल जा बेटी…..

आशा :क्यों आपको नहीं पता क्या समस्या है???

दाई :नहीं छोरी…. इस गाँव में पंचायत के मामले में और मर्दों के बीच में बोलने की आजादी हम जनानियों को कहाँ?किन्तु इतना जरूर पता है कि समस्या बहुत बड़ी है. शायद पूरे गाँव पर कोई मुसीबत आई से..

आशा : दाई जी..जनानियाँ मर्दों से किसी मामले कम तो नहीं है.. फिर इस गाँव में ही ऐसा क्यों..; रानी लक्ष्मी बाई ने तो पूरे देश को बचाने लिए हाथ में तलवार ले ली थी. तो क्या इस गांव की स्त्रियां अपने गाँव को मुसीबत से नहीं बचा सकती हैं…

दाई : बात तो थारी सही है छोरी… लेकिन.. तू तो जानती है न कि…

आशा :दाई सा… मैं सब जानती हूँ लेकिन इतनी बड़ी मुसीबत में अगर आप लोग अब भी चूल्हे चौके से बाहर नहीं निकलोगे तो बाद में माथा पीटने और रोने के अलावा कुछ नहीं बचेगा…
(आशा की बात सुनकर दाई की आँखों में भी उम्मीद की किरण जाग उठी)

दाई :आशा तो क्या मैं गाँव की बाकी स्त्रियों को भी बुला लाऊँ…

आशा: हाँ हाँ दाई सा मैं भी आपसे यही कहना चाह रही थी… जाइए उन्हें. भी बुला लाइये.
(दाई गाँव की कई अन्य महिलाओं को बुलाती है)

दाई :ओ मुन्नी की माँ… ओह रनियाँ, कमली… ओ…..
(सभी स्त्रियाँ दाई के पास आती हैं)

मुन्नी : क्या हुआ दाई सा? 
रनियाँ : क्या हुआ दाई - सा क्यों बुलाया मने.
(सभी एक एक करके दाई से उन्हें बुलाने का कारण पूछती हैं और दाई  उन्हें सब खुलकर बताती है और सब को मनाने समझाने में सफल होती है. सब पंचायत में पहुँचती हैं)

दृश्य4:

(सब दुखी मन से बैठे हैं) 
ग्रामीण 1: हम उन्हें नहीं देंगे हमारी जमीन... मुखिया जी चाहे हमारी जान ही क्यों न चली जाए.

पंचायत में उपस्थित सभी पुरुष : हाँ हाँ बिलकुल नहीं  देंगे..... बिलकुल नहीं देंगे.... 
मुखिया जी आप ही कुछ उपाय निकालिये... वे हमे यहां से बेदखल कर देंगे तो हम कहाँ जाएंगे? 
मुखिया : कुछ तो उपाय निकालना ही पड़ेगा. हम अपनी ज़मीनें नहीं देंगे. 

ग्रामीण : मुखिया जी; ….हम क्या करेंगे ….वे हमारी जमीनें हड़प लेंगे और यहां फैक्ट्री बनाएंगे; सोचिए कितना प्रदूषण फैलेगा!!!!!

मुखिया : हाँ वे बड़े प्रभावशाली लोग हैं ….पर हम भी क्या करें उन्होंने अधिकांश गाव वालों को ज्यादा पैसे का लालच देकर  बहुत कम क़ीमत पर काग़ज़ों पर अंगूठे का निशान ले लिया है.... हमारा वकील भी उनके हाथों बिक गया है. अब तो भगवान ही मालिक है।

आशा : मुखिया जी.. यदि इजाजत हो तो कुछ कहूँ….
ग्रामीण 1 :(चौंकता हुआ) ये छोरी कौन है? और ये गाँव की जनानियाँ…. यहां पंचायत में मर्दों के बीच क्या करने आई हैं !
दूसरा ग्रामीण : ए छोरी तू कौन है?? और यहां के कर रही है . तुझे ना पता के…; कि पंचायत मे जनानियों का आना मना है.

आशा : मुखिया जी;  मैं आपकी मदद करना चाहती हूं. इसलिए यहां आई हूँ.

ग्रामीण 2: तू ?!... ( हंसते हुए) तू हमारी क्या मदद करेगी…. जा रसोई सम्हाल… ये पंचायत वन्चायत सब मर्दों का काम है.

(एक ग्रामीण भागता हुआ पंचायत के बीच आता है)
ग्रामीण 3:(हांफते हुए) मुखिया जी वो बिल्डर अपने ढेर सारे गुंडों के साथ इधर ही आ रहा है हमें डर है कि कहीं वह हमे इसी समय इस बस्ती से निकाल ना दे;

आशा :मुखिया जी मैं कह रही हूं ना मेरी बात एक बार सुन कर देखिए अगर आपको गलत लगे; तो मैं नहीं बोलूंगी.. 

ग्रामीण 2: ए छोरी तू क्या कर पावेगी? ये सब थारे बस का ना से……

आशा :मैं जानती हूं कि मैं आप सबके सामने बहुत छोटी हूं किंतु अगर एक बार आप मेरी बात ध्यान से सुन ले तो शायद उपाय निकाल आए…

ग्रामीण 3: ठीक है मुखिया जी एक बार हम इसकी बात भी सुन लेते हैं अब तक तो हम नहीं कुछ कर पाए. हो सकता है इसके उपाय में ही कुछ दम हो
देख छोरी जी अगर तेरी बात में दम ना हुआ तो तू दोबारा नहीं बोलेगी

आशा :ठीक है परंतु एक बार आप मेरी बात सुन लीजिए

मुखिया :चल बोल क्या बोल रही है….

आशा :मुखिया जी मैं एक वकील हूँ.
सभी ग्रामीण :( आश्चर्य से एक दूसरे की ओर देखने लगते हैं) ये छोरी वकील है……???

आशा : हाँ…. और मैं जानती हूं कि अभी इतनी जल्दी तो कुछ नहीं किया जा सकता. लेकिन एक एक उपाय है मेरे पास…. सत्याग्रह….

मुखिया :सत्याग्रह मतलब धरना

आशा :हां मुखिया जी धरना….
बस हमें उन्हें गांव में आने से रोकना होगा इसलिए हमें गांव की सीमा पर ही धरना देना होगा….. चाहे स्त्री हो हो या पुरुष हो….. बूढ़ा हो या जवान सभी लोगों को.

मुखिया :उससे क्या होगा??? और बाकी सब तो ठीक है.. पर वहां जनानियों का के काम???

आशा :मुखिया जी… औरतें होंगी तो हमारी ताकत और बढ़ेगी… उससे हमारी बात पुलिस और प्रशासन तक पहुंचेगी.
मुखिया: नहीं नहीं औरतें नहीं. औरतें घर की रसोई में ही अच्छी लगती हैं….. यूँ.. यू बीच बाजार सबके सामने औरतें..... नहीं छोरी ये ना हो सके है…

आशा :मुखिया जी औरते चांद तक पहुंच गई हैं और आप आज भीवही अटके हैं! 

मुखिया :(गुस्से से) छोरी …

ग्रामीण :इन सबसे कुछ ना होने का छोरी.. पुलिस भी तो उन्हीं लोगों की जेब में है…. हमने कितनी बार पुलिस से बात की किंतु वे हमें धमकी देकर वहां से भगा देते हैं और एक भी बार हमारी शिकायत नहीं लिखी.

आशा :मुखिया जी जमाना बदल गया है. अब तो इंटरनेट का जमाना है पुलिस हमारी बात सुनेगी .. . और प्रशासन को भी हम पर ध्यान देगा.
बस अब बिना देर किए आपलोग अभी गाँव की सीमा की ओर बढ़िए और मैं आप सबकी वीडियो बनाकर सोशल मीडिया के जरिए वायरल करती हूँ... . साथ ही साथ इस केस को मैं कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी करती हूँ. देखते हैं हमारी बात उनके कानों तक कैसे नहीं पहुँचती??

ग्रामीण :हाँ ये छोरी ठीक कह रही है. मने इसकी बात मे दम लागे से मुखिया जी.
मुखिया :ठीक है जैसा तुम सबने ठीक लागे…

ग्रामीण :हाँ. हाँ चलो रे सब

कोरस :
उजड़ा था चमन जो कलियों से
अब फिर से बहारें आयेंगी
मंझधार मे गोते खाती थी
नैया भी नारे लग जाएगी!

ग्रामीण : ओ बींदडी... तू भी चल धरना देण वास्ते... 
एक स्त्री :मैं बापू - सा???
हाँ ,,,,,,,,,,अब लागे से के हमारे दुख के दिन गए. 

ग्रामीण : छोरी होके देखो कितनी अच्छी सलाह दी है इसने... 

दूसरी स्त्री :हाँ हाँ राजू के बापू.. 

मुखिया  :(अपनी पगड़ी उतारते हुए आशा के आगे झुकता है ) छोरी  तूने आज हम सबको बहुत बड़ी मुसीबत से बचा लिया.. मैं थारा ये एहसान कदी न उतार पाऊँगा. 

आशा :(आशा अपने पिता को अपने पाँवों में झुकने से रोकती है और सहसा उसके मुँह से निकलता है। ) नहीं.. नहीं. बापू - सा... 

मुखिया :( चौंकते हुए) बापू सा!!!! ... छोरी.... ये तू क्या... 
दाई :हाँ.. हाँ हुकुम... ये आशा आपणी ही छोरी है.. 
(मुखिया की आँखों से आँसू छलक उठते हैं.) 
मुखिया : (दाई और आशा की ओर देखते हुए) 
दाई... आशा.... आज तुमने मेरी आँखें खोल दीं...

मुखिया :(सभी ग्रामीणों से) आज से मैं शपथ लेता हूं कि गाँव की किसी भी बेटी बहू के साथ अब कोई अत्याचार नहीं होने दूँगा... गाँव की किसी ल़डकी को पढ़ने लिखने की कोई मनाही नहीं होगी .. और  उनके साथ कोई भेदभाव नहीं होने दूँगा. क्योंकि छोरा और छोरी में कोई अन्तर ना से.. 

सभी ग्रामीण:( सहमति में सिर हिलाते हुए)  हाँ हाँ मुखिया जी  हम भी शपथ लेते हैं अपनी छोरियों को पढ़ा लिखाकर आशा जैसी काबिल बनाएंगे। 

आशा: बापू सा हमारे पास ज्यादा समय नहीं है..इसके पहले कि बिल्डर और उसके गुंडे यहाँ पहुँचे... हमें गाँव की सीमा पर पहुंचना होगा.. 

मुखिया :हाँ हाँ.. आशा बिटिया ठीक कह रही है.. चलो सब.... 
(सभी गाँव की सीमा की ओर बढ़ते हैं और आशा उनके वीडियो बनाते हुए आगे बढ़ती है)


सभी ग्रामीण:( गाते हुए आगे बढ़ते हैं ) 
बढ़े चलो बढ़े चलो
एका बढ़ते ही जावे.. "बढ़े चलो..... 
घनघोर अँधेरा छाये.... बढ़े चलो... 
कोई हमसे जीत ना पावे.." "" ";
चले चलो , चले चलो
मिट जाए जो टकराए , चले चलो


कोरस :
चलो चलें भई.. चलो चलें
दूजे नगर दूजे गाँव चले
उनको भी य़ह कथा सुनाए
परिपाटी को छोड़ पुरानी
अपनी नई प्रथा चलाएं 
एका की ताकत बतलाएं
नए रंग नव ढंग लिए हम
जीर्ण विचारों को हम छोड़े
कहो कहो भई…. कहो कहो
कैसी लगी यह कथा कहो! 

  समाप्त  

सर्वाधिकार सुरक्षित
सुधा सिंह ✒️


Saturday, August 29, 2020

गणपति स्तुति (दोहे)



1:

यही मनोरथ देव है, रखिए हम पर हाथ। 

सुखकर्ता सुख दीजिए , तुम्हें नवाऊँ माथ।।

 2:

प्रथम पूज्य गणराज जी,  पूर्ण कीजिए काज।

सकल मनोरथ सुफल हों, विघ्न न आए आज।।

 3:

वक्रतुण्ड हे गजवदन , एकदंत भगवान 

आश्रय में निज लीजिए, बालक मैं अनजान। 

4:

रिद्धि-सिद्धि दायी तुम्हीं, दो शुभता का  दान 

ज्ञान विशारद ईश हे , प्रज्ञा दो वरदान।। 

5:

हे देवा प्रभु विनायका, गौरी पुत्र गणेश।

प्रथम पूजता जग तुम्हें , दूर करो तुम क्लेश।। 

6:

मुख पर दमके है प्रभा, कंठी स्वर्णिम  हार।

प्रभु विघ्न को दूर करो, हो भव सागर पार ।। 

7:

ज्ञानवान कर दो मुझे , माँगूँ यह वरदान।

शरण तुम्हारे मैं पड़ी,  देवा कृपा निधान।। 

8:

दुखहर्ता रक्षक तुम्हीं, तुम हो पालन हार।,

पार करो भव मोक्षदा, तुम ही हो भर्तार ।। 

9:

मंगलमूर्ति कष्ट हरो, संकट में है जान ।

आयी हूँ प्रभु द्वार मैं , रखिए मेरा मान ।।

10:

हे गणपति गणराज हे, दर्शन की है प्यास 

देव मेरी पीर हरो,तुमसे ही है आस।। 

Tuesday, August 25, 2020

हिंदी दिवस... भाषण


Hindi diwas
हिन्दी दिवस 







दोहा :
हिंदी भाषा सुन सदा, गर्वित मन का व्योम। 
निज भाषा यह रस भरी , हर्षित होता लोम ।। 

प्रिय शिक्षक साथियों,

आपके समक्ष प्रस्तुत है हिंदी दिवस भाषण का एक उदाहरण. उम्मीद है आपकी सहायता हो सकेगी.
( आपके किसी काम आ सकूँ तो अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें. आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुमूल्य है)
................ 🎤🎤🎤🎤🎤🎤🎤🎤......................

प्रातः प्रणाम...


माननीय प्रधानाचार्य, शिक्षक गणों, शिक्षिकाओं और यहां उपस्थित सभी विद्यर्थियों.... मुझे यहां आमंत्रित करने के लिए सर्वप्रथम मैं आप सभी सुधि जनों का हृदयतल से आभार प्रकट करना चाहूंगी. आज का कार्यक्रम देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा. सभी बच्चे इतने गुणी और इतने प्रतिभाशाली हैं कि निर्णय लेना मुश्किल हो रहा था कि विजेता किसको घोषित किया जाए..

बच्चों, निर्णायक की कुर्सी पर बैठना गर्व की बात जरुर है पर यकीन मानिए उस पद के साथ इंसाफ़ करना उतना ही मुश्किल...

मैं हिंदी भाषा की कोई बहुत बड़ी ज्ञानी नहीं हूँ कि हिंदी विषय की गहराइयों तक पहुंच पाऊँ. हिन्दी बहुत ऊँची है. शायद इतनी कि हम उसकी ऊंचाई का अंदाजा भी नहीं लगा सकते.

वर्तमान समय में हिंदी का जो स्तर है उसे देखकर बड़ी निराशा होती है. यह स्तर धीरे धीरे नीचे गिरता जा रहा है. उसका लगातार ह्रास हो रहा है.

बच्चों,  हम हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं क्या  आपको नहीं लगता कि  हम सूखते हुए वृक्ष की पत्तियों को सींच रहे हैं.

हम भूल जाते हैं कि कोई भी पेड़ हरा- भरा,  विशाल व छायादार तभी रह सकता है  जब हम उसकी जड़ों को सींचे. उसकी ठीक तरह से देखभाल करें. मुझे डर है कि  जिस तरह देव भाषा संस्कृत मात्र वेदों और पुराणों की पुस्तकों में सिमट गई है. आज केवल गिने चुने लोग ही है जो उसे बोलते और समझते हैं. उसी तरह आज की स्थिति यदि यूँ ही बरकरार रहती है तो कहीं हमारी यह भाषा भी अपना अस्तित्व न खो दे और केवल पुस्तकों में सिमट कर ही न रह जाए.

इसका कारण केवल यही है कि हम अपनी भाषा को बेहद हीन समझते हैं।हम हिन्दी बोलने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं. हिन्दी को कुलियों की और अँग्रेजी को कुलीनों की भाषा समझते हैं.

बच्चों, यह बात किसी से भी छिपी नहीं है कि जापान जैसा छोटा सा देश, जो हमारे देश से पूरे 9  गुना छोटा है  विश्व युद्ध में पूरी तरह से बर्बाद होने के बाद भी किस तरह से उठ खड़ा हुआ. आज तकनीक के मामले में उसकी साख मानी जाती है. उनकी इस तरक्की के पीछे का राज है... उनकी अपनी भाषा में व अपनी संस्कृति में उनका गहन विश्वास. उनकी लगन और उनका कड़ा परिश्रम.


इतिहास गवाह है कि तकनीक हो या ज्ञान, ये कभी किसी भाषा के मोहताज नहीं रहे. और दूसरों का मुँह ताकने वाले कभी सफल भी नहीं हुए.

वे सभी देश जो विकसित देशों की सूची में आते हैं. यदि आप उनके बारे में अध्ययन करें तो पाएंगे कि सभी देश अपनी ही भाषा का प्रयोग करके तरक्की की सीढियां चढ़े. उन्होंने दूसरी भाषा की शरण नहीं ली..

बच्चों विभिन्न भाषाओँ का ज्ञान होना बहुत अच्छी बात है. परन्तु दूसरी भाषा के मोह में अपनी भाषा का तिरस्कार  करना  या अपनी भाषा को बोलने में शर्माना  कहाँ तक सही है? जरा सोचिए...

धन्यवाद...


Sunday, August 23, 2020

एंकरिंग स्क्रिप्ट (हिंदी दिवस)



मेरे प्रिय शिक्षक मित्रों व प्रिय छात्रों ,

हिन्दी दिवस निकट आ रहा है इसलिए यहाँ उदाहरणार्थ हिन्दी दिवस की एंकरिंग स्क्रिप्ट  आप सबकी सहायता के लिए प्रस्तुत है. आवश्यकतानुसार आप इसमें परिवर्तन कर सकते हैं.
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हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में आप सभी का सहर्ष स्वागत है
आदरणीय निर्णायक गण, सभी शिक्षिकाएँ व यहां उपस्थित सभी विद्यर्थियों को प्रातः प्रणाम!
हमारे प्यारे प्यारे विद्यार्थी
प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी हिंदी की विभिन्न विधाओं व विभिन्न रंगों की छटा बिखेरते हुए और प्रथम चरण को पार करते हुए अंतिम चरण तक आ पहुँचे हैं . पिछले वर्षों तक हम अर्थात कक्षा 9 और 10 के विद्यार्थी हास्य कविता का आनंद लेते रहे थे परंतु इस वर्ष अंग्रेजी की परफॉर्मेंस पोयम की तर्ज पर  हमने भी हिंदी में performance poem करने की सोची. और नतीजा आपके सामने है अब इस साल हम इस विधा का भी आनंद उठाएंगे.

सच मानिए इस विधा की प्रस्तुति आसान नहीं होती, क्योंकि एक दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाना आसान नहीं होता.
फिर भी हमारे इन विद्यार्थियों ने जी तोड़ मेहनत की है.
और वैसे भी ....... विद्यालय के विद्यार्थी किसी भी मामले  में किसी से कम नहीं है वो तो चाहे तो क्या नहीं कर सकते!!!!

निर्णायक पद की कुर्सी पर शोभायमान है... प्यारी प्यारी..... मैम (महोदया) , और  हिन्दी भाषा विज्ञ हमारी प्यारी मैम (महोदया ) ...
तो एक बार जोरदार तालियों से स्वागत करते हैं हमारे  निर्णायक गणों का..

आइए अब शुरुआत करते हैं अपने कार्यक्रम का..
सबसे पहले आ रहे हैं
1...... और उनका ग्रुप जिनकी कविता का शीर्षक है - ..


बहुत बढिया.. बहुत बढ़िया..

अगली प्रतिभागी हैं --
2:.......
जिनका साथ दे रही है.... . और इनकी कविता का शीर्षक है -..... .



भई वाह... बहुत खूब..
मुझे तो गब्बर की बात याद आ गई.. जो  डर गया.. वो मर गया..

अपनी कविता - शुक्र है शिक्षक हूँ कोई और नहीं ! "प्रस्तुत करने आ रही है ---

3:.......... (छात्रों के नाम)
 तो जोरदार तालियों से स्वागत कीजिए हमारी
इस जोड़ी का..



कमाल.. कमाल.. कमाल...

अब बारी है उनकी..  इतिहास का भूत... जिनका कभी पीछा ही नहीं छोड़ते...
चलिए उनका भी दुखड़ा सुन लेते हैं और बुलाते हैं
4:.......... के ग्रुप(समूह ) को...
तालियाँ........



वाह... वाह.. वाह  मजा आ गया
सचमुच... मुझे भी यकीन हो गया है कि इतिहास  का भूत बहुतों को डराने की ताकत रखता है..

चलिए इतिहास की बात इतिहास में दफन करते हैं और बुलाते हैं अपने अगले प्रतिभागियों को...
  अरे ये क्या... हमारे अगले प्रतिभागी भी हमें इतिहास की  ही सैर कराने आ रहे हैं ...
 ..बच्चों... वीर रस से ओत प्रोत यह कविता हमारे और आपके भीतर देशभक्ति जागृत करने के लिए काफी है ...

तो चलिए सुनते हैं अगली कविता... खूब लड़ी मरदानी.... जिसे प्रस्तुत करने आ रही है...
5:....... (छात्रों के नाम)
स्वागत कीजिए इनका जोरदार तालियों से...





भई वाह.. रानी लक्ष्मी बाई.. जिसकी वीरता और साहस के अंग्रेजों को मुँह की खान पड़ी थी. ऐसी वीरांगना को हमारा शत शत नमन

बच्चों... आगे बढ़ते हैं और बुलाते हैं
अपने अगले प्रतियोगियों को जो कुछ ढूंढ रहे हैं पर उन्हें मिल नहीं रहा है
आपको उनकी मदद की आवश्यकता है
चलिए बुलाते हैं..

6:........... के ग्रुप को और जानते हैं कि आखिर वे ढूँढ क्या रहे हैं???



बहुत खूब... बहुत खूब...

सचमुच शोचनीय बात है कि आखिर ये सब कहाँ नदारद हो गए!!!

खैर.. अब बारी आती है अगले ग्रुप को बुलाने की
जो बड़े दावे के साथ कहते है..
मैं वीर हूँ.. डरपोक नहीं...
जोरदार तालियाँ हो जाए
7:...... और उसके ग्रुप के लिए...


बहुत बहुत बहुत.. अच्छी प्रस्तुति...
और आप लोग बिल्कुल भी डरपोक नहीं...
...
बच्चों... अब हम अपने आखिरी पड़ाव पर पहुँच चुके हैं इसलिए बुलाते हैं अपने अगले ग्रुप को...
...... आ रहे हैं...
अपनी कविता  -...... "" लेकर ...
जोरदार तालियों से स्वागत कीजिए हमारे आखिरी प्रतिद्वंदियों का....
तालियाँ......


बहुत अच्छा प्रदर्शन....

इसी के साथ हमारी यह प्रतियोगिता समाप्त होती है..
अब मैं आपसे रूबरू होने के लिए आमंत्रित करना चाहूंगी..... मैम को..
........ मैम ....

धन्‍यवाद!!!!





Monday, July 13, 2020

एक गुड़िया माँ मुझे दिला दो


एक गुड़िया मुझे दिला दो माँ:
(स्थायी 17,16 अंतरा 16,16)



एक गुड़िया मुझे दिला दो माँ , 
मैं उसका ब्याह रचाऊँगी ।
लाल नारंगी पीत सुनहरे,  
वसनों से उसे सजाऊँगी ।।

गोरे रंगों वाली गुड़िया,
माँ आँखें नीली-नीली हों ।
सुंदर-सुंदर केशों वाली ,
लगती जो छैल छबीली हो ।।
निश दिन उसके संग खेलूँगी ,
अरु बाहर भी ले जाऊँगी ।

सीखूँगी जो विद्यालय में ,
वह आकर उसे पढाऊँगी।
कभी डॉक्टर ,इंजीनियर अरु ,
वैज्ञानिक कभी बनाऊँगी ।।
तुम जैसे माँ ममता लुटाती,
मैं उससे लाड़ लड़ाऊँगी।

भूख लगेगी जब गुड़िया को,
बर्गर व पिज्जा खिलाऊँगी ।
सखियों-सा चाहूँगी उसको,
रूठी तो उसे मनाऊँगी ।
आएगी निंदिया रानी जब,
लोरी तब उसे सुनाऊँगी।


Monday, June 1, 2020

भारत में टिड्डी हमला

भारत में टिड्डी हमला...... पर क्या हम इसके लिए तैयार हैं ????

एक ओर से  चीन हमें आँखें  दिखा रहा है तो दूसरी ओर नेपाल भी नए तेवर में नजर आ रहा है।कोरोना, अम्फान, भूकंप, जैसी विपदाएँ क्या कम थी जो टिड्डियाँ भी अपना विनाशकारी रूप ले भारत पर चढ़ाई कर बैठी हैं। 
पिछले कई महीनों से कोरोना वायरस से जूझ रहे भारत के लिए टिड्डियों ने बैठे बिठाए एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है। कई प्रदेशों में टिड्डी दल ने किसानों से लेकर आम जनता को भी परेशान करना शुरू कर दिया है।

टिड्डे (locust/grasshopper) लघु श्रृंगीय टिड्डे प्रवासी कीट होते हैं। जिनकी उड़ान दो हजार मील तक होती है। जब वे अकेले होते हैं तो वे हानिरहित होते हैं, लेकिन जब उनकी आबादी बढ़ जाती है तो वे विनाशकारी हो जाते हैं और फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाते हैं। भारत में 1964-1997 के दौरान 13 बार टिड्डों के हमले का सामना किया गया है। भारत में जोधपुर में टिड्डी चेतावनी संगठन है।

अतीत में, भारत में टिड्डी हमले खरीफ के मौसम के दौरान जून से नवंबर तक देखे गए हैं। हालांकि इस साल शुरुआती बारिश के कारण हमला जल्दी हुआ। वर्षा में वृद्धि टिड्डियों को प्रजनन भूमि प्रदान करती है। हिंद महासागर का द्विध्रुवीय(Indian ocean dipole) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सकारात्मक आईओडी (Iod)भारत और पूर्वी अफ्रीकी क्षेत्र जैसे सूडान में उच्च वर्षा का कारण बनता है।

झांसी मंडल के उप कृषि निदेशक के अनुसार यह टिड्डी दल ईरान में पैदा हुआ, जो पाकिस्तान के रास्ते भारत पहुँचा है।लॉक डाउन में मानव गतिविधियाँ कम हो जाने के कारण टिड्डियों की संख्या अब अरबों में पहुँच गई है।

टिड्डे के दल ने पश्चिमी भारत में पाकिस्तान से प्रवेश किया और राजस्थान, हरियाणा पंजाब मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश पर हमला किया।अभी जुलाई तक राजस्थान में टिड्डी दलों के कई हमले जारी रहने की आशंका जताई जा रही है।वे उत्तर भारत के अलावा बिहार और उड़ीसा भी पहुँच सकते हैं।
टिड्डियों का उपद्रव शुरू हो जाने के बाद  उन्हें नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। इसपर नियंत्रण पाने के लिए हवाई जहाज से विषैली ओषधियों का छिड़काव, विषैले चारे में भीगी हुई गेहूँ की भूसी का फैलाव इत्यादि, उपयोगी होता है।
हालांकि सरकार ने किसानों को इन टिड्डियों द्वारा फसलों को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए कीटनाशकों का उपयोग करने के लिए कहा है।

Thursday, April 9, 2020

'कि की' की कहानी


धुन :आओ सिखाएँ तुम्हें अंडे का फंडा

आओ सुनायें "कि" "की" की कहानी।
छोटी - सी एक बात है, तुमको बतानी।
एक है छोटी (ह्रस्व) "कि"
और दूजी बडी  (दीर्घ ) "की"
सुनने में एक समान, पर फर्क बड़ा जी।
सुनने में एक समान, पर फर्क बड़ा जी।

बड़ी की है जोड़ती, दो शब्दों को। 
छोटी कि है जोड़ती, दो वाक्यों को। 

"राम की माँ का ,नाम है रीमा"
कौन-सी की आई ?जरा मुझको बताना
बोलो .....
कौन-सी की आई ? जरा मुझको बताना

बड़ी "कीऽऽऽ..."
हाँ.....बड़ी कीऽऽऽ...
एक वाक्य का एक अंश, होती है बड़ी की।
एक वाक्य का एक अंश, होती है बड़ी की।

आओ सुनायें "कि" "की"  की कहानी।
छोटी सी एक बात, है मुझे तुमको बतानी।
एक है छोटी कि, और दूजी बड़ी की।
सुनने में एक समान, पर फर्क बड़ा जी।


संवाद जब भी आये, आती है छोटी "कि"
जैसे,राम ने कहा कि मुझे घर जाना है। "
श्याम ने कहा कि उसे खाना खाना है।"

कौनसी "की" आई ?जरा मुझको बताना
बोलो .....
कौनसी 'की 'आई ?जरा मुझको बताना
छोटी "किऽऽऽ..."
हाँ ...."छोटी ऽऽऽ..."
तो जोड़ने का काम करती है छोटी कि।
हाँ हाँ.. जोड़ने का काम करती है छोटी कि।

("कि" और" कि" हिंदी के ऐसे शब्द हैं जो बहुधा हमें भ्रमित कर देते हैं। कई बार समझ नहीं आता कि छोटी मात्रा लगेगी या बड़ी मात्रा। इसी के विधान (नियम) को कुछ उदाहरणों के साथ इस छोटी से कविता के माध्यम से यहाँ प्रस्तुत करने का एक छोटा सा प्रयास किया है मैंने।उम्मीद है यह कविता आपके काम आएगी।) 

Thursday, February 20, 2020

मक्खी और मधुमक्खी.. बाल कविता

मक्खी 

मक्खी की मधुमक्खी से
हो गई भोर में भेंट।
जल्दी खूब थी मक्खी को
और हो गई थी व‍ह लेट।।

मक्खी बोली, " हे मधुप,
रोको न मुझे,
बड़े जोर की भूख लगी है,
कर नहीं सकती वेट!
कूडे वाला आ जाएगा,
सारा कूड़ा ले जाएगा!
फिर मैं भूखी रह जाऊँगी,
मेरा नहीं भरेगा पेट!

मक्खी की सुनकर बातें,
 मधुमक्षिका बोल उठी  ,
" मत घबराओ मक्खी तुम,
मैंने एक बगिया है देखी-

जहाँ रंग बिरंगे फूल खिले,
हरे, गुलाबी, नीले, पीले!

तुम भी रस पान वहाँ करना,
नहीं स्वाद मिले तो फिर कहना!
अहा,
चम्पा की महक के क्या कहने,
मुँह से पानी लगता बहने!

गुड़हल का रंग लुभाता है!
गेंदा भी बड़ा सुहाता है!

पारिजात, और कनेर भी,
स्वाद बड़ा ही देते हैं।
सूरजमुखी और सदाबहार,
मन मोह हमारा लेते हैं।
चल माखी हम उस देश चलें,
जहाँ भाँति भाँति के पुहुप खिले!

सुनकर बातें मधुमक्खी की
घृणा हो गई मक्खी को।
 बोली, "सुन मधुप ध्यान से बात मेरी,
यह सब मैं बिलकुल ना खाती।
मैं कूडे में हूँ सुख पाती।।

अपना ही राग लगी गाने!
खाने का स्वाद तू क्या जाने !

चल तुझे आज बतलाती हूँ,
खाना तुझको सिखलाती हूँ।।
व‍ह देख नाली में मल है जो,
चल स्वाद चखें, स्वादिष्ट है वो।।

तू देख रहा उस बालक को,
रिस रहा है पस जिसके तन से!
वही मुझको अच्छा लगता है,
पीती हूँ खूब बड़े मन से!
उस स्वाद के आगे सबकुछ फेल
तेरा मेरा है नहीं  मेल!

सुनकर बातें मक्षिका की
मधुमक्खी ने बिचकाया मुँह!
बोली, " तुम गंदा ही तो खाती हो
छीः  ऊपर से इतराती हो!
कभी शहद बनाकर भी चख लो!
अरे थोड़ी सी मेहनत कर लो!

य़ह सुन मक्खी को आया क्रोध,
 बोली," तुझको  कुछ नहीं बोध।।
 सुन बात मुमाखी बतलाऊँ,
तेरे झांसे में, मैं न आऊँ!
इतनी मेहनत मैं करूँ क्यों,
जब मुफ्त में सबकुछ पाती हूँ!
अरे पका - पकाया खाती हूँ,
और सुख का जीवन जीती हूँ!

 यह सुन मधु मक्खी दंग हुई,
सोचा मैं व्यर्थ में तंग हुई।।
मक्खी तो आखिर मक्खी है,
गंदगी पे ही तो बैठेगी।।

छोड़ के मक्खी का परिवेश,
उड़ गई मधुमक्खी अपने देश।।



Saturday, February 15, 2020

छत्रपति शिवाजी.... हिन्दी पोवाड़ा




जी जी जी जी........
राजे ऐसा सत्ताधारी, राजे ऐसा सत्ताधारी
जी जी जी जी........

धन्य हो गई धरा राष्ट्र की, गूँज उठी थी शिवऩेरी 
पशु पक्षी भी लगे नाचने, पुलकित थे सब नर नारी 

जन्म लिया जब छत्रपति ने बजने लगी थी रणभेरी 
लाल महल में गूंज उठी थी राजे की किलकारी

चहक उठी तब भारत भूमि, छंट गई रात अँधेरी 
जीजाऊ ने तब भड़काई स्वराज की चिनगारी   

अस्त्र शस्त्र, शास्त्रों की ज्ञाता, थी वीरांगना नारी 
ज्ञान देती थी शिवराजे को सबका बारी बारी 

अग्नि स्वराज की लगी धधकने, उठा ली जिम्मेदारी
सब के दिल में राज किया, था ऐसा
सत्ताधारी

शिवराया सत्ताधारी, राजे ऐसा सत्ताधारी
जी जी जी जी........


Friday, February 7, 2020

माँ बतलाओ....बाल गीत


माँ बतलाओ , चंदा मामा
घर पर क्यों नहीं आते हैं !

राजू मामा, चिंटू मामा 
सब अपने घर आते हैं !
रक्षा बंधन पर सब तुमसे
राखी भी बँधवाते हैं 

खेल -खेलकर संग मेरे  
सब मेरा मन बहलाते हैं
रानी बहना से भी वे सब
कितना लाड लड़ाते हैं l

फिर बोलो माँ चंदा मामा 
क्यों अपने घर नहीं आते हैं 

माँ, इसका कुछ राज़ तो खोलो ...
क्यों हमसे रूठे वे बोलो ....
चौथ पूर्णिमा ,जल तुम देती 
तुम उनकी पूजा भी करती
फिर भी  वो  इतराते हैं ...

बोलो माँ, क्यों चंदा मामा 
घर अपने नहीं आते हैं ..

सुन मेरे मुन्ने ,बात बताऊँ...
तुमसे न कोई राज छुपाऊँ...
चंदा मामा व्यस्त बड़े हैं
उनके सिर कई काम पड़े हैं...

मेरे तुम्हारे सब के लिए ही
दूर देश वे जाते हैं
जेब में उजियारे को भरकर
लौट के फिर वे आते हैं
रात में मुन्ने धवल उजाला
 हम उनसे ही पाते हैं
दिन में सूरज खूब जलाता
 वे इसीलिए छिप जाते हैं


माँ समझा अब बात पते की
तभी तो थक  वे जाते हैं
और कभी दिखते हैं दुर्बल
कभी फूल के कुप्पा होते हैं


हम इतवार मनाते जैसे
वे प्रतिपदा मनाते हैं
शनिवार हम छुट्टी करते 
अमाँ में वे सोने जाते हैं।

माँ  , परहित में चंदा मामा
कितना कुछ सह जाते हैं
ठंडी, गर्मी, बारिश में भी
अपना फर्ज निभाते हैं।

हाँ जाना क्यों चंदा मामा 
अपने घर नहीं आते हैं ...


©®सर्वाधिकार सुरक्षित
सुधा सिंह 'व्याघ्र'





Saturday, February 1, 2020

जिजीविषा



नव रूप, रंग, आस
हरित मखमली गात
नव जिजीविषा के साथ
मैं प्रस्फुटित हूँ आज

नव सूर्य उम्मीदों का
है संग संग मेरे सदा
लड़ना है हर झंझा से
खानी नहीं मुझे मात

शुचि निर्मल तुहिन तन
मधुरिम परिवेश से निज बंधन
यही ऐषणा हिय की अहो
बढ़ता रहूँ दिन रात

परमार्थ ही है लक्ष्य
नहीं खिन्न , जो बनूँ भक्ष्य
जीवन मिला सुनहरा
उसे क्यों गवाऊँ तात्

निज धर्म और कर्म से
कर ना सकूँ प्रतिघात
लड़ता रहूँ परिवेश से
सो प्रस्फुटित हूँ आज











Wednesday, January 29, 2020

बिल्ली रानी.. बाल गीत





बिल्ली ने इकदिन शीशे में,
देखी जब मतवाली चाल।
फूली नहीं समाई,
सोचा.. मैं तो चलती बड़ा कमाल।।

चाल पे मेरी दुनिया कायल,
अब चाल पे टैक्स लगाऊँगी।
ढेरों पैसे मिलेंगे मुझको ,
 मालामाल  हो जाऊँगी ।।

मेरी कैट वॉक देखने,
चीते - शेर भी आयेंगे।
ऐसा अंदाज़ दिखाऊँगी,
जिसे भूल नहीं वो पाएँगे।।
विश्व में मेरे चर्चे होंगे ,
होगा चारों ओर धमाल ।
बस थोड़ा - सा डायट कर लूँ ,
और पिचका लूँ अपने गाल।।

कुत्ते को रख लूँगी नौकर ,
मूषक ढूँढ वो लाएगा ।
उसने मेरी बात न मानी ,
तो व‍ह जूते खाएगा ।।
मालकिन की बात को टाले,
उसकी ऐसी नहीं मज़ाल ।
नहीं बचेगा मेरे हाथों ,
अगर करेगा टालम-टाल ।।

इन्हीं ख़यालों में डूबी थी ,
पीछे से कोई गुर्राया ।
सपनों में जिसे नौकर रखा ,
अरे रे..वही उसे खाने आया।।
सरपट भागी बिल्ली रानी ,
मन से निकले सभी खयाल ।
जान बच गई वही बहुत है ,
अब न चलूँ मतवाली चाल ।।



सुधा सिंह व्याघ्र












Tuesday, December 31, 2019

मुझको भी आलोकित कर दो (बाल गीत)



मुझको भी आलोकित कर दो।


सूरज दादा ,सूरज दादा
इतने पीत वर्ण कैसे हो!
लगता है कुंदन के बने हो!
कुंदन थोड़ा मुझमें भर दो।
मैं भी जग में चमका करूँगा।
मुझको भी आलोकित कर दो।

सुबह सवेरे जग जाते हो।
भोर की लाली तुम लाते हो।
कुम्हलाई कलियों को खिलाकर
अंबर में तुम मुस्काते हो।
परसेवा हिय में मेरे भर दो।
मुझको भी आलोकित कर दो।

सर्दी, गर्मी, ठंडी, वर्षा
तुमको कोई रोक न पाया ।
हर मौसम ने करवट बदली पर
तुमको सदा अडिग ही पाया।
मुझमें भी यही दृढ़ता भर दो।
मुझको भी आलोकित कर दो।

तुम ही सृष्टि के संचालक।
तुम ही हो हम सबके पालक।
अनुशासन का मंत्र सिखाते।
नहीं किसी से तुम घबराते।
वही अनुशासन मुझमें भर दो।
मुझको भी आलोकित कर दो।

जब भी तुम विश्राम को जाते।
हम केवल अँधियारा पाते।
अँधियारे को दूर भगाकर
प्राण शक्ति सबमें भरते हो।
उसी ऊर्जा से मुझको भर दो।
मुझको भी आलोकित कर दो।











Tuesday, December 17, 2019

क्रोध...


Kavita, krodh, anger management, chandan, vandan
क्रोध



क्रोध कहो, या कह लो गुस्सा
या फिर इसे कहो तुम रोष
नहीं किसी भी और का,
इसमें  है बस अपना दोष

कहो कभी हम गुस्से से
कुछ भी हासिल कर पाए हैं?
जब भी क्रोध ने हमको घेरा
तब - तब हम पछताए हैं!!!

क्यों कर हम खुद पर ही बोलो
नहीं नियंत्रण कर नियंत्रण कर पाते?
क्यों दूजे के हाथों में हम
चाबी गुस्स्स्से की  दे आते!

जीवन में कटुता य़ह लाता
सुंदरता चेहरे की खाता
य़ह मन को अपने बहकाता
अंत में केवल है पछताता।

तो क्रोध को छोड़ो य़ह दुश्मन है
अपनी काया तो चंदन है
क्रोध का सांप न लिपटे जिसको
ऐसी काया को वन्दन है।
ऐसे ही मन को वंदन है।।

रचनाकार - सुधा सिंह 

Friday, October 25, 2019

प्रयाण कर..

तिरंगा झंडा



प्रयाण कर प्रयाण कर, तू मत किसी से आज डर।
माँ भारती का पुत्र तू, माँ भारती पर नाज कर ।।
देश का प्यारा तिरंगा, झुकने कभी पाए नहीं ।
उत्तुंग शिखर हिमगिरि का, पुकारता प्रयाण कर।।

 प्रयाण कर, प्रयाण कर.....

जाति - पाँती भेदभाव, रंग - द्वेष भूल कर।
मनुष्यता की राह में, सद्भाव का प्रसार कर।।
संत मुनियों की धरा ये, त्राहि त्राहि कर रही ।
आतंक के आकाओं का, समूल तू विनाश कर।।

 प्रयाण कर, प्रयाण कर.....

नापाक इरादों के संग, है शत्रु आगे बढ़ रहा।
चीर कर शत्रु का सीना , देश को निहाल कर।।
ध्वस्त कर शत्रु का दुर्ग, नवराष्ट्र का निर्माण कर।
व्योम पर फहरा तिरंगा, गगन को प्रस्थान कर।।

प्रयाण कर, प्रयाण कर.....

कारवां अतिवात का, गुबार संग ला रहा।
है काल यह निशिथ का , आलोक का प्रसार कर।।
मिसाल वीरता की तू, तू लाल, बाल, पाल है।
तेरी कीर्ति धूमिल न हो, तू कुछ नया विधान कर।।

प्रयाण कर, प्रयाण कर.....

प्राचीन बंध तोड़ दे , और लीक से हटकर तू चल।
पुकारती मंजिल खड़ी, तू राष्ट्र का उत्थान कर।।
हर रोज दिवाली मने, चहुँ ओर बिखरे रोशनी।
दीप जगमगा उठे, रावण का मर्दन मान कर।।

 प्रयाण कर, प्रयाण कर.....         

Sunday, October 13, 2019

माँ शारदे....( गेय वन्दना)

Saraswati puja 


हे शारदे , माँ शारदे, अपनी शरण में लीजिए! 
ज्ञान चक्षु खोलकर, विद्या का वर हमें दीजिए!! 

अज्ञानी हैं, दोषी हैं हम, निर्दोष हमको कीजिए! 

पंथ से भटके हुए हैं , सुलभ पथ को कीजिए!! 

श्वेतांबरा, माँ सरस्वती, चित्त है बड़ा व्याकुल मेरा! 

आध्यात्म का वरदान दे, उत्कर्ष मेरा कीजिए!! 

है तिमिर का आतंक चहुँ दिश, मलिनता आछन्न है! 

इस स्याह कलुषित भीषिका का नाश समुचित कीजिए!! 

मद, मोह, ईर्ष्या, द्वेष हमपर, हावी कभी न हो, ऐ माँ! 

तुम हो दया की मूर्ति उपकार हम पर कीजिए!! 

हे ज्ञानदा, माँ शतरूपा , मैं करूँ आवाहन आपका ! 

सब बंधनों से मुक्तकर, मन को आलोकित कीजिए!! 
  

Saturday, October 12, 2019

बचपन....

बाल्यावस्था
बचपन 

बचपन!!! 
कहो, किस नाम से तुम्हें पुकारूँ! 
बेफिक्री, निश्छलता, निश्चिंतता, 
किस शब्‍द से उच्चारूँ! 

तुमसे जुड़े हर नाम से सुखद पय ही तो 
रिसता पाया! 
धूप हो, बारिश हो, सर्दी हो या गर्मी 
तुमने जीवन को सदा उमंगों से सजाया! 

कभी बाहर, कभी भीतर!
बस धमा-चौकड़ी दिन भर! 
कीचड़ से लथपथ और पसीने में तर! 
धूप से न होता, कभी करियाने का डर! 

कागज की नावें, चलाने की होड़! 
तितली की पूँछ में बांध दी, पतली से डोर! 

घर में मचा हल्ला, मैं सिपाही तू चोर! 
चल आज चढ़ते हैं पेड़, और तोड़ते हैं बोर! 

न भोजन की फिक्र न पढ़ाई की बातें! 
निश्चिंत दिन और निश्चिंत रातें! 

राजा के किस्से, गुड़िया की शादी! 
पापा की डांट से बचाती थी दादी! 

मेजोरिटी विंस और डाईन तेरी! 
नहीं, नहीं डाईन तेरी, न कि डाईन मेरी! 

पल वो सुनहरे और सुनहरी वो यादें! 
रहते तुम दिल में , तुम्हें कैसे भुला दें! 

इस मुरझाई बगिया के, पुष्प फिर खिला दें 
लौट आ, ओ बचपन! तुम्हें तुमसे मिला दें 





रचनाएँ जो सबसे ज्यादा सराही गईं