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Monday, July 13, 2020

एक गुड़िया माँ मुझे दिला दो


एक गुड़िया मुझे दिला दो माँ:
(स्थायी 17,16 अंतरा 16,16)



एक गुड़िया मुझे दिला दो माँ , 
मैं उसका ब्याह रचाऊँगी ।
लाल नारंगी पीत सुनहरे,  
वसनों से उसे सजाऊँगी ।।

गोरे रंगों वाली गुड़िया,
माँ आँखें नीली-नीली हों ।
सुंदर-सुंदर केशों वाली ,
लगती जो छैल छबीली हो ।।
निश दिन उसके संग खेलूँगी ,
अरु बाहर भी ले जाऊँगी ।

सीखूँगी जो विद्यालय में ,
वह आकर उसे पढाऊँगी।
कभी डॉक्टर ,इंजीनियर अरु ,
वैज्ञानिक कभी बनाऊँगी ।।
तुम जैसे माँ ममता लुटाती,
मैं उससे लाड़ लड़ाऊँगी।

भूख लगेगी जब गुड़िया को,
बर्गर व पिज्जा खिलाऊँगी ।
सखियों-सा चाहूँगी उसको,
रूठी तो उसे मनाऊँगी ।
आएगी निंदिया रानी जब,
लोरी तब उसे सुनाऊँगी।


Thursday, February 20, 2020

मक्खी और मधुमक्खी.. बाल कविता

मक्खी 

मक्खी की मधुमक्खी से
हो गई भोर में भेंट।
जल्दी खूब थी मक्खी को
और हो गई थी व‍ह लेट।।

मक्खी बोली, " हे मधुप,
रोको न मुझे,
बड़े जोर की भूख लगी है,
कर नहीं सकती वेट!
कूडे वाला आ जाएगा,
सारा कूड़ा ले जाएगा!
फिर मैं भूखी रह जाऊँगी,
मेरा नहीं भरेगा पेट!

मक्खी की सुनकर बातें,
 मधुमक्षिका बोल उठी  ,
" मत घबराओ मक्खी तुम,
मैंने एक बगिया है देखी-

जहाँ रंग बिरंगे फूल खिले,
हरे, गुलाबी, नीले, पीले!

तुम भी रस पान वहाँ करना,
नहीं स्वाद मिले तो फिर कहना!
अहा,
चम्पा की महक के क्या कहने,
मुँह से पानी लगता बहने!

गुड़हल का रंग लुभाता है!
गेंदा भी बड़ा सुहाता है!

पारिजात, और कनेर भी,
स्वाद बड़ा ही देते हैं।
सूरजमुखी और सदाबहार,
मन मोह हमारा लेते हैं।
चल माखी हम उस देश चलें,
जहाँ भाँति भाँति के पुहुप खिले!

सुनकर बातें मधुमक्खी की
घृणा हो गई मक्खी को।
 बोली, "सुन मधुप ध्यान से बात मेरी,
यह सब मैं बिलकुल ना खाती।
मैं कूडे में हूँ सुख पाती।।

अपना ही राग लगी गाने!
खाने का स्वाद तू क्या जाने !

चल तुझे आज बतलाती हूँ,
खाना तुझको सिखलाती हूँ।।
व‍ह देख नाली में मल है जो,
चल स्वाद चखें, स्वादिष्ट है वो।।

तू देख रहा उस बालक को,
रिस रहा है पस जिसके तन से!
वही मुझको अच्छा लगता है,
पीती हूँ खूब बड़े मन से!
उस स्वाद के आगे सबकुछ फेल
तेरा मेरा है नहीं  मेल!

सुनकर बातें मक्षिका की
मधुमक्खी ने बिचकाया मुँह!
बोली, " तुम गंदा ही तो खाती हो
छीः  ऊपर से इतराती हो!
कभी शहद बनाकर भी चख लो!
अरे थोड़ी सी मेहनत कर लो!

य़ह सुन मक्खी को आया क्रोध,
 बोली," तुझको  कुछ नहीं बोध।।
 सुन बात मुमाखी बतलाऊँ,
तेरे झांसे में, मैं न आऊँ!
इतनी मेहनत मैं करूँ क्यों,
जब मुफ्त में सबकुछ पाती हूँ!
अरे पका - पकाया खाती हूँ,
और सुख का जीवन जीती हूँ!

 यह सुन मधु मक्खी दंग हुई,
सोचा मैं व्यर्थ में तंग हुई।।
मक्खी तो आखिर मक्खी है,
गंदगी पे ही तो बैठेगी।।

छोड़ के मक्खी का परिवेश,
उड़ गई मधुमक्खी अपने देश।।



Friday, February 7, 2020

माँ बतलाओ....बाल गीत


माँ बतलाओ , चंदा मामा
घर पर क्यों नहीं आते हैं !

राजू मामा, चिंटू मामा 
सब अपने घर आते हैं !
रक्षा बंधन पर सब तुमसे
राखी भी बँधवाते हैं 

खेल -खेलकर संग मेरे  
सब मेरा मन बहलाते हैं
रानी बहना से भी वे सब
कितना लाड लड़ाते हैं l

फिर बोलो माँ चंदा मामा 
क्यों अपने घर नहीं आते हैं 

माँ, इसका कुछ राज़ तो खोलो ...
क्यों हमसे रूठे वे बोलो ....
चौथ पूर्णिमा ,जल तुम देती 
तुम उनकी पूजा भी करती
फिर भी  वो  इतराते हैं ...

बोलो माँ, क्यों चंदा मामा 
घर अपने नहीं आते हैं ..

सुन मेरे मुन्ने ,बात बताऊँ...
तुमसे न कोई राज छुपाऊँ...
चंदा मामा व्यस्त बड़े हैं
उनके सिर कई काम पड़े हैं...

मेरे तुम्हारे सब के लिए ही
दूर देश वे जाते हैं
जेब में उजियारे को भरकर
लौट के फिर वे आते हैं
रात में मुन्ने धवल उजाला
 हम उनसे ही पाते हैं
दिन में सूरज खूब जलाता
 वे इसीलिए छिप जाते हैं


माँ समझा अब बात पते की
तभी तो थक  वे जाते हैं
और कभी दिखते हैं दुर्बल
कभी फूल के कुप्पा होते हैं


हम इतवार मनाते जैसे
वे प्रतिपदा मनाते हैं
शनिवार हम छुट्टी करते 
अमाँ में वे सोने जाते हैं।

माँ  , परहित में चंदा मामा
कितना कुछ सह जाते हैं
ठंडी, गर्मी, बारिश में भी
अपना फर्ज निभाते हैं।

हाँ जाना क्यों चंदा मामा 
अपने घर नहीं आते हैं ...


©®सर्वाधिकार सुरक्षित
सुधा सिंह 'व्याघ्र'





Tuesday, December 31, 2019

मुझको भी आलोकित कर दो (बाल गीत)



मुझको भी आलोकित कर दो।


सूरज दादा ,सूरज दादा
इतने पीत वर्ण कैसे हो!
लगता है कुंदन के बने हो!
कुंदन थोड़ा मुझमें भर दो।
मैं भी जग में चमका करूँगा।
मुझको भी आलोकित कर दो।

सुबह सवेरे जग जाते हो।
भोर की लाली तुम लाते हो।
कुम्हलाई कलियों को खिलाकर
अंबर में तुम मुस्काते हो।
परसेवा हिय में मेरे भर दो।
मुझको भी आलोकित कर दो।

सर्दी, गर्मी, ठंडी, वर्षा
तुमको कोई रोक न पाया ।
हर मौसम ने करवट बदली पर
तुमको सदा अडिग ही पाया।
मुझमें भी यही दृढ़ता भर दो।
मुझको भी आलोकित कर दो।

तुम ही सृष्टि के संचालक।
तुम ही हो हम सबके पालक।
अनुशासन का मंत्र सिखाते।
नहीं किसी से तुम घबराते।
वही अनुशासन मुझमें भर दो।
मुझको भी आलोकित कर दो।

जब भी तुम विश्राम को जाते।
हम केवल अँधियारा पाते।
अँधियारे को दूर भगाकर
प्राण शक्ति सबमें भरते हो।
उसी ऊर्जा से मुझको भर दो।
मुझको भी आलोकित कर दो।











Saturday, October 12, 2019

बचपन....

बाल्यावस्था
बचपन 

बचपन!!! 
कहो, किस नाम से तुम्हें पुकारूँ! 
बेफिक्री, निश्छलता, निश्चिंतता, 
किस शब्‍द से उच्चारूँ! 

तुमसे जुड़े हर नाम से सुखद पय ही तो 
रिसता पाया! 
धूप हो, बारिश हो, सर्दी हो या गर्मी 
तुमने जीवन को सदा उमंगों से सजाया! 

कभी बाहर, कभी भीतर!
बस धमा-चौकड़ी दिन भर! 
कीचड़ से लथपथ और पसीने में तर! 
धूप से न होता, कभी करियाने का डर! 

कागज की नावें, चलाने की होड़! 
तितली की पूँछ में बांध दी, पतली से डोर! 

घर में मचा हल्ला, मैं सिपाही तू चोर! 
चल आज चढ़ते हैं पेड़, और तोड़ते हैं बोर! 

न भोजन की फिक्र न पढ़ाई की बातें! 
निश्चिंत दिन और निश्चिंत रातें! 

राजा के किस्से, गुड़िया की शादी! 
पापा की डांट से बचाती थी दादी! 

मेजोरिटी विंस और डाईन तेरी! 
नहीं, नहीं डाईन तेरी, न कि डाईन मेरी! 

पल वो सुनहरे और सुनहरी वो यादें! 
रहते तुम दिल में , तुम्हें कैसे भुला दें! 

इस मुरझाई बगिया के, पुष्प फिर खिला दें 
लौट आ, ओ बचपन! तुम्हें तुमसे मिला दें 





Wednesday, April 24, 2019

तन्हा पेड़... बाल कविता




जलती धूप में तन्हा पेड़, तटस्थ अड़ा खड़ा है पेड़ ।
जड़ा, पाला, शरद, शिशिर, की माया झेला करता पेड़।।

कभी मलय पवन, कभी लूह तपन, सदा सुख-दुख सहता रहता पेड़।
खग, विहग का बना आसरा, अपना फर्ज निभाता पेड़।।

पढ़िए एक प्रेरक कविता : एकता

घाम, बवंडर, झंझावात , सभी से लड़ता रहता पेड़।
भूख मिटाता राहगीर की, छाँव सभी को देता पेड़।।

जहर घुला है हवा में जोउसको अवशोषित करता पेड़।
डटा रहे सदा लक्ष्य पे अपने, वसुधा की शान बढ़ाता पेड़।।

जलती धूप में तन्हा पेड़,
तटस्थ अड़ा खड़ा है पेड़।

Friday, July 27, 2018

मेरा खिलौना.. ( बाल कविता)

मेरा खिलौना मेरी कार
( कक्षा 2,3 के विद्यार्थियों के लिए)

मुझको प्यारी मेरी कार, सबसे न्यारी मेरी कार
मेरे पिछले जन्मदिवस पर, मेरी मम्मी लाई कार

इतना सुंदर रंग है इसका, सबको भाई मेरी कार
तेज गति है.. सर्र से दौड़े.. , सबको हराए मेरी कार

काले - काले टायर इसके, चम- चम बिजली जैसे चमके
देख के सबका मन ललचाए, ऐसी अनोखी मेरी कार

बंटी चुन्नू देखके जलते, रूठ - रूठ के रोया करते
अपनी मम्मी से जिद करते, ला दो कविश के जैसी कार

पिस्टन कप का बना विजेता, ग्रैंड प्री भी इसने जीता
कहो बताऊँ उसका नाम , जो है मेरी प्यारी कार.

अरे.. उसके आगे सब बेकार , वो है मेरी मैक्वीन कार.
मुझको प्यारी मेरी कार, सबसे न्यारी मेरी कार


©®सुधा सिंह 📝


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