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Monday, July 13, 2020

एक गुड़िया माँ मुझे दिला दो


एक गुड़िया मुझे दिला दो माँ:
(स्थायी 17,16 अंतरा 16,16)



एक गुड़िया मुझे दिला दो माँ , 
मैं उसका ब्याह रचाऊँगी ।
लाल नारंगी पीत सुनहरे,  
वसनों से उसे सजाऊँगी ।।

गोरे रंगों वाली गुड़िया,
माँ आँखें नीली-नीली हों ।
सुंदर-सुंदर केशों वाली ,
लगती जो छैल छबीली हो ।।
निश दिन उसके संग खेलूँगी ,
अरु बाहर भी ले जाऊँगी ।

सीखूँगी जो विद्यालय में ,
वह आकर उसे पढाऊँगी।
कभी डॉक्टर ,इंजीनियर अरु ,
वैज्ञानिक कभी बनाऊँगी ।।
तुम जैसे माँ ममता लुटाती,
मैं उससे लाड़ लड़ाऊँगी।

भूख लगेगी जब गुड़िया को,
बर्गर व पिज्जा खिलाऊँगी ।
सखियों-सा चाहूँगी उसको,
रूठी तो उसे मनाऊँगी ।
आएगी निंदिया रानी जब,
लोरी तब उसे सुनाऊँगी।


Thursday, April 9, 2020

'कि की' की कहानी


धुन :आओ सिखाएँ तुम्हें अंडे का फंडा

आओ सुनायें "कि" "की" की कहानी।
छोटी - सी एक बात है, तुमको बतानी।
एक है छोटी (ह्रस्व) "कि"
और दूजी बडी  (दीर्घ ) "की"
सुनने में एक समान, पर फर्क बड़ा जी।
सुनने में एक समान, पर फर्क बड़ा जी।

बड़ी की है जोड़ती, दो शब्दों को। 
छोटी कि है जोड़ती, दो वाक्यों को। 

"राम की माँ का ,नाम है रीमा"
कौन-सी की आई ?जरा मुझको बताना
बोलो .....
कौन-सी की आई ? जरा मुझको बताना

बड़ी "कीऽऽऽ..."
हाँ.....बड़ी कीऽऽऽ...
एक वाक्य का एक अंश, होती है बड़ी की।
एक वाक्य का एक अंश, होती है बड़ी की।

आओ सुनायें "कि" "की"  की कहानी।
छोटी सी एक बात, है मुझे तुमको बतानी।
एक है छोटी कि, और दूजी बड़ी की।
सुनने में एक समान, पर फर्क बड़ा जी।


संवाद जब भी आये, आती है छोटी "कि"
जैसे,राम ने कहा कि मुझे घर जाना है। "
श्याम ने कहा कि उसे खाना खाना है।"

कौनसी "की" आई ?जरा मुझको बताना
बोलो .....
कौनसी 'की 'आई ?जरा मुझको बताना
छोटी "किऽऽऽ..."
हाँ ...."छोटी ऽऽऽ..."
तो जोड़ने का काम करती है छोटी कि
हाँ हाँ.. जोड़ने का काम करती है छोटी कि।

("कि" और" कि" हिंदी के ऐसे शब्द हैं जो बहुधा हमें भ्रमित कर देते हैं। कई बार समझ नहीं आता कि छोटी मात्रा लगेगी या बड़ी मात्रा। इसी के विधान (नियम) को कुछ उदाहरणों के साथ इस छोटी से कविता के माध्यम से यहाँ प्रस्तुत करने का एक छोटा सा प्रयास किया है मैंने।उम्मीद है यह कविता आपके काम आएगी।) 

Friday, February 7, 2020

माँ बतलाओ....बाल गीत


माँ बतलाओ , चंदा मामा
घर पर क्यों नहीं आते हैं !

राजू मामा, चिंटू मामा 
सब अपने घर आते हैं !
रक्षा बंधन पर सब तुमसे
राखी भी बँधवाते हैं 

खेल -खेलकर संग मेरे  
सब मेरा मन बहलाते हैं
रानी बहना से भी वे सब
कितना लाड लड़ाते हैं l

फिर बोलो माँ चंदा मामा 
क्यों अपने घर नहीं आते हैं 

माँ, इसका कुछ राज़ तो खोलो ...
क्यों हमसे रूठे वे बोलो ....
चौथ पूर्णिमा ,जल तुम देती 
तुम उनकी पूजा भी करती
फिर भी  वो  इतराते हैं ...

बोलो माँ, क्यों चंदा मामा 
घर अपने नहीं आते हैं ..

सुन मेरे मुन्ने ,बात बताऊँ...
तुमसे न कोई राज छुपाऊँ...
चंदा मामा व्यस्त बड़े हैं
उनके सिर कई काम पड़े हैं...

मेरे तुम्हारे सब के लिए ही
दूर देश वे जाते हैं
जेब में उजियारे को भरकर
लौट के फिर वे आते हैं
रात में मुन्ने धवल उजाला
 हम उनसे ही पाते हैं
दिन में सूरज खूब जलाता
 वे इसीलिए छिप जाते हैं


माँ समझा अब बात पते की
तभी तो थक  वे जाते हैं
और कभी दिखते हैं दुर्बल
कभी फूल के कुप्पा होते हैं


हम इतवार मनाते जैसे
वे प्रतिपदा मनाते हैं
शनिवार हम छुट्टी करते 
अमाँ में वे सोने जाते हैं।

माँ  , परहित में चंदा मामा
कितना कुछ सह जाते हैं
ठंडी, गर्मी, बारिश में भी
अपना फर्ज निभाते हैं।

हाँ जाना क्यों चंदा मामा 
अपने घर नहीं आते हैं ...


©®सर्वाधिकार सुरक्षित
सुधा सिंह 'व्याघ्र'





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